Nishad Reservation: अयोध्या से मुकेश सहनी का 2027 तक अल्टीमेटम, बोले- आरक्षण नहीं तो वोट नहीं : Uttaroradesh.0rg
Nishad Reservation को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। विकासशील इंसान पार्टी यानी VIP के संस्थापक और बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश सहनी ने अयोध्या पहुंचकर निषाद समाज के आरक्षण, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को साफ संदेश दिया कि निषाद समाज अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा।
मुकेश सहनी ने रामलला के दर्शन से पहले कहा कि भगवान श्रीराम और निषादराज का संबंध केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और न्याय का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जिस समाज के पूर्वजों ने भगवान राम की नाव पार लगाई थी, आज उसी समाज की नाव मझधार में फंसी हुई है। सहनी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने निषाद समाज को आरक्षण देने का वादा कई बार किया, लेकिन अब तक यह वादा पूरा नहीं हुआ।
अयोध्या से निकला यह राजनीतिक संदेश सीधे UP Election 2027 की तैयारी से जुड़ता दिख रहा है। निषाद, मछुआरा और नदी किनारे बसे समुदाय पूर्वांचल की कई सीटों पर असर रखते हैं। ऐसे में मुकेश सहनी की सक्रियता BJP, निषाद पार्टी और विपक्ष ,तीनों के लिए नई चुनौती बन सकती है।
Nishad Reservation पर मुकेश सहनी का सीधा संदेश
मुकेश सहनी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में निषाद समाज अब आरक्षण के मुद्दे पर निर्णायक लड़ाई लड़ेगा। उन्होंने 2027 तक का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर निषाद समाज को आरक्षण नहीं मिला तो समाज “आरक्षण नहीं तो वोट नहीं” का संकल्प लेगा।
उन्होंने दावा किया कि आने वाले दिनों में निषाद समाज के लाखों लोग गंगाजल हाथ में लेकर संकल्प लेंगे। इस संकल्प का संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विपक्षी दलों तक पहुंचाया जाएगा। सहनी का कहना है कि यह लड़ाई किसी पद या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के शिक्षा, रोजगार और सम्मान के लिए है।
उनके इस बयान ने उत्तर प्रदेश में निषाद राजनीति को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब तक निषाद समाज की राजनीति में डॉ. संजय निषाद और निषाद पार्टी का प्रभाव माना जाता रहा है, लेकिन मुकेश सहनी की सक्रियता से इस आधार में नई प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।
25 जुलाई से 101 दिन की निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा
मुकेश सहनी ने उत्तर प्रदेश में 25 जुलाई से 101 दिन की “निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा” निकालने का ऐलान किया है। यह यात्रा अलग-अलग जिलों में जाकर निषाद समाज को आरक्षण, सामाजिक अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी के मुद्दे पर संगठित करेगी।
सहनी का कहना है कि यह यात्रा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के भीतर जागरूकता अभियान होगी।
इसमें निषाद समाज के लोगों को यह बताया जाएगा कि अधिकार केवल वादों से नहीं, बल्कि संगठित दबाव से मिलते हैं।
यात्रा के जरिए VIP पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश करेगी। बिहार की राजनीति में “सन ऑफ मल्लाह” के रूप में पहचान बनाने वाले मुकेश सहनी अब यूपी में निषाद समाज के बीच अपनी जगह बनाना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि निषाद आरक्षण को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा बना दिया जाए।
संजय निषाद पर हमला, BJP के लिए बढ़ेगी मुश्किल?
मुकेश सहनी ने निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री डॉ. संजय निषाद पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में रहने के बावजूद निषाद समाज को आरक्षण नहीं दिलाया गया। सहनी ने कहा कि समाज ऐसे नेतृत्व को स्वीकार नहीं करेगा, जो मूल मुद्दों पर समझौता कर चुका हो।
यह बयान BJP के लिए भी असहज स्थिति बना सकता है। डॉ. संजय निषाद की पार्टी NDA का हिस्सा है और निषाद समाज में उनकी राजनीतिक पकड़ BJP के लिए पूर्वांचल में उपयोगी रही है। लेकिन अगर आरक्षण का मुद्दा तेज हुआ और समाज के भीतर नाराजगी बढ़ी, तो विपक्ष और VIP जैसी पार्टियां इस असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बना सकती हैं।
UP Election 2027 में NDA सहयोगियों की सीट दावेदारी पहले से ही चर्चा में है। RLD, सुभासपा, अपना दल और निषाद पार्टी जैसे सहयोगी दल अपने-अपने सामाजिक आधार के हिसाब से हिस्सेदारी चाहते हैं। ऐसे माहौल में निषाद आरक्षण का मुद्दा सीट शेयरिंग और गठबंधन की राजनीति को और जटिल कर सकता है।
अयोध्या से संदेश क्यों अहम है?
मुकेश सहनी ने यह संदेश अयोध्या से दिया, इसलिए इसका प्रतीकात्मक महत्व और बढ़ जाता है। अयोध्या भाजपा की राजनीति में भावनात्मक और वैचारिक केंद्र रही है। राम मंदिर निर्माण को BJP अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है। ऐसे में निषाद समाज के अधिकारों की मांग को भगवान राम और निषादराज के संबंध से जोड़ना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति माना जा सकता है।
सहनी ने कहा कि भाजपा भगवान राम के नाम पर राजनीति करती है, लेकिन निषाद समाज को उसका अधिकार नहीं मिला। यह बयान सीधे BJP की धार्मिक राजनीति बनाम सामाजिक न्याय की बहस को छूता है।
अयोध्या इन दिनों कई राजनीतिक घटनाओं के कारण चर्चा में है। राम मंदिर दान विवाद को लेकर भी विपक्ष भाजपा पर सवाल उठा रहा है। इस पर विस्तृत संदर्भ अयोध्या दान विवाद और 2027 चुनाव में देखा जा सकता है। ऐसे समय में मुकेश सहनी का अयोध्या पहुंचना और आरक्षण का मुद्दा उठाना 2027 की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
पूर्वांचल में निषाद वोट बैंक का असर
उत्तर प्रदेश में निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप और मछुआरा समाज की उपस्थिति कई जिलों में महत्वपूर्ण है। खासकर पूर्वांचल, अवध और गंगा-घाघरा-सरयू किनारे बसे इलाकों में ये समुदाय चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।
गोरखपुर, संतकबीरनगर, महाराजगंज, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, प्रयागराज, अयोध्या, बस्ती और आसपास के जिलों में निषाद समाज का असर अलग-अलग स्तर पर दिखता है। यही कारण है कि हर चुनाव में निषाद समाज की राजनीतिक भागीदारी पर दलों की नजर रहती है।
2022 विधानसभा चुनाव में BJP ने अपने सहयोगियों के साथ गैर-यादव पिछड़ों और अति पिछड़े वर्गों को साधने की रणनीति अपनाई थी। निषाद पार्टी ने भी NDA के साथ रहते हुए कुछ सीटों पर प्रभाव दिखाया था। लेकिन 2027 से पहले अगर आरक्षण का सवाल फिर से जोर पकड़ता है, तो BJP को अपने सहयोगी दलों और समाज की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
छोटे दलों की राजनीति में बढ़ती बेचैनी
2027 विधानसभा चुनाव से पहले छोटे दलों की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है। सुभासपा पूर्वांचल में अपनी दावेदारी बढ़ा रही है, RLD पश्चिमी यूपी में सीट हिस्सेदारी चाहती है, बसपा अकेले चुनाव की तैयारी कर रही है और आजाद समाज पार्टी भी टिकट चयन में सक्रिय दिख रही है।
इसी क्रम में VIP की सक्रियता NDA और विपक्ष दोनों के लिए संकेत है। मुकेश सहनी भले ही अभी उत्तर प्रदेश में बड़े संगठनात्मक ढांचे के साथ न दिखें, लेकिन निषाद आरक्षण जैसा भावनात्मक और सामाजिक मुद्दा उन्हें चर्चा में ला सकता है।
सुभासपा की 63 सीटों पर दावेदारी और BJP Mission 61 Seats जैसी राजनीतिक हलचल बताती है कि 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम सपा नहीं रहेगा। इसमें छोटे दलों, जातीय समूहों और सामाजिक मुद्दों की भूमिका भी निर्णायक होगी।
BJP के सामने दोहरी चुनौती
मुकेश सहनी के बयान से BJP के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है। पहली चुनौती है निषाद समाज की आरक्षण मांग पर स्पष्ट जवाब देना। दूसरी चुनौती है अपने सहयोगी डॉ. संजय निषाद की राजनीतिक विश्वसनीयता को संभालना।
अगर BJP इस मुद्दे को हल्के में लेती है, तो विपक्ष इसे “वादाखिलाफी” के रूप में पेश कर सकता है। अगर BJP आरक्षण पर कोई ठोस पहल करती है, तो इसका असर जातीय राजनीति और संवैधानिक प्रक्रिया दोनों पर पड़ेगा। इसलिए यह मुद्दा केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि नीति और सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रश्न भी है।
NDA में सहयोगियों की भूमिका पर चल रही बहस को देखते हुए यह मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है। BJP का 2027 मेगा प्लान कठिन सीटों और जातीय समीकरणों पर केंद्रित है। ऐसे में निषाद समाज जैसे समुदाय की नाराजगी किसी भी चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकती है।
अयोध्या से मुकेश सहनी ने निषाद आरक्षण को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की शुरुआत कर दी है। उनका “आरक्षण नहीं तो वोट नहीं” वाला संदेश सीधे BJP और निषाद पार्टी नेतृत्व को चुनौती देता है। 25 जुलाई से प्रस्तावित 101 दिन की संकल्प यात्रा इस मुद्दे को गांव-गांव और जिले-जिले तक ले जाने की कोशिश होगी।
सहनी की रणनीति साफ है—निषाद समाज को आरक्षण, सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल पर एकजुट करना। अब देखना यह होगा कि BJP, डॉ. संजय निषाद और विपक्ष इस मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
2027 चुनाव अभी दूर है, लेकिन निषाद आरक्षण का सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर से तेज हो चुका है। अगर यह मुद्दा जमीन पर पकड़ बनाता है, तो पूर्वांचल और नदी किनारे बसे कई जिलों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।